खाड़ी में तेल गैस नहीं बल्कि हम और आप जल रहे हैं @ मांगें राम चौहान
ईरान-इजरायल युद्ध में तेल टैंकरों और ऊर्जा केंद्रों पर बमबारी से पर्यावरण पर भी पड़ रहा है प्रभाव

ईरान-इजरायल युद्ध में तेल टैंकरों और ऊर्जा केंद्रों पर बमबारी से पर्यावरण पर पड़ने वाला प्रभाव फरवरी 2026 से शुरू हुए अमेरिका-इजरायल बनाम ईरान युद्ध ने मध्य पूर्व को न केवल सैन्य और आर्थिक संकट में डाला है, बल्कि पर्यावरणीय आपदा की ओर भी धकेल दिया है। इस संघर्ष में दोनों पक्षों ने जानबूझकर ऊर्जा ढांचों को निशाना बनाया है। इजरायली और अमेरिकी हमलों में ईरान के तेल डिपो, रिफाइनरी, गैस फील्ड्स (जैसे साउथ पार्स) और ईंधन भंडारण केंद्रों पर हमले हुए, जबकि ईरान ने जवाबी कार्रवाई में फारस की खाड़ी में तेल टैंकरों, सऊदी, कतर, यूएई और ओमान के ऊर्जा केंद्रों पर ड्रोन-मिसाइल हमले किए। होर्मुज स्ट्रेट में यातायात 80-97% तक घट गया, सैकड़ों टैंकर फंस गए और कई क्षतिग्रस्त हो गए। इन हमलों से तेल रिसाव, आग और विषैले धुएं ने हवा, पानी, मिट्टी और समुद्री पारिस्थितिकी को बुरी तरह प्रभावित किया है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह 1991 के गल्फ वॉर की याद दिलाता है, जहां जलते तेल कुओं ने पूरे क्षेत्र को काला कर दिया था। इस युद्ध में पर्यावरणीय क्षति दीर्घकालिक और बहुआयामी है, जो न केवल स्थानीय समुदायों बल्कि वैश्विक जलवायु को भी प्रभावित कर रही है।सबसे गंभीर प्रभाव समुद्री प्रदूषण के रूप में सामने आया है। फारस की खाड़ी, जो विश्व के 20% तेल और गैस निर्यात का मार्ग है, अब तेल रिसाव का शिकार बन गई है। मार्च 2026 तक कम से कम 12 तेल टैंकर क्षतिग्रस्त या आग की चपेट में आए, ओमान, बहरीन और यूएई के पास इन टैंकरों पर ड्रोन हमलों से आग लगी और तेल रिसाव हुआ CEOBS (Conflict and Environment Observatory) के अनुसार, इन घटनाओं से तेल रिसाव का खतरा बहुत बढ़ गया है। खाड़ी का नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र—कोरल रीफ्स, मैंग्रोव वन और सीग्रास मीडोज—तेल की परत से ढक सकता है। 1980 के दशक के ईरान-इराक युद्ध और 1991 के गल्फ वॉर में तेल रिसाव ने हॉक्सबिल सी टर्टल जैसी प्रजातियों को लगभग विलुप्त कर दिया था। अब भी मछलियां, पक्षी, डॉल्फिन और समुद्री जीव विषैले हाइड्रोकार्बन (PAHs) से प्रभावित हो रहे हैं। रिसाव से पानी में ऑक्सीजन कम होने से मछली पालन और मछुआरों की आजीविका खतरे में है। ईरानी नौसेना द्वारा होर्मुज में हमलों से 150 से अधिक टैंकर फंस गए, जिससे रिसाव की संभावना और बढ़ गई। Greenpeace की चेतावनी के अनुसार, एक बड़ा रिसाव खाड़ी के पूरे इकोसिस्टम को दशकों तक ठीक नहीं होने देगा। वायु प्रदूषण दूसरा बड़ा संकट है। तेहरान के आसपास शाहरण और शहर-ए ईंधन डिपो पर इजरायली हमलों से विशाल आग लगी। 8 मार्च 2026 को इन आगों से काला धुआं आसमान छा गया, जिसे ‘ब्लैक रेन’ या तेजाबी बारिश कहा गया। सल्फर डाइऑक्साइड (SO2), नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx), पार्टिकुलेट मैटर (PM), कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) और पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (PAHs) जैसे विषैले पदार्थ हवा में फैल गए। ईरानी रेड क्रिसेंट सोसाइटी और स्वास्थ्य मंत्रालय ने लोगों को घरों में रहने की सलाह दी। नागरिकों में सिरदर्द, आंखों और गले में जलन, सांस लेने में तकलीफ की शिकायतें आईं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के प्रमुख टेड्रोस एडनॉम गेब्रेयेसस ने चेतावनी दी कि पेट्रोलियम सुविधाओं को नुकसान से हवा, पानी और भोजन प्रदूषित हो रहा है, खासकर बच्चों, बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों के लिए। डॉ. अक्षय देवरास (यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग) के अनुसार, तेल की आग से बने सल्फर और नाइट्रोजन यौगिक बारिश में घुलकर अम्लीय वर्षा पैदा करते हैं, जो फेफड़ों, त्वचा और यहां तक कि डीएनए को नुकसान पहुंचाते हैं। कतर के रास लाफ्फान और सऊदी के रास तनुरा रिफाइनरी पर हमलों से भी धुआं का गुबार उठा, जो नीचे की ओर हवा के साथ फैला। ये प्रदूषक ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ावा देते हैं, क्योंकि CO2 और मीथेन उत्सर्जन बढ़ा है। मिट्टी और जल स्रोतों पर प्रभाव भी विनाशकारी है। तेहरान के आसपास तेल रिसाव से सड़कें, मिट्टी और पानी की आपूर्ति दूषित हो गई। प्रो. एंड्रिया सेला (यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन) के अनुसार, विस्फोटों से निकले भारी धातु, सुगंधित यौगिक और कच्चा तेल मिट्टी में घुलकर फसलें, पेयजल और भोजन श्रृंखला को प्रभावित कर रहे हैं। खाड़ी क्षेत्र में रिसाव से भूजल और नदियां प्रभावित हो रही हैं। ये प्रदूषक कृषि को नुकसान पहुंचा रहे हैं, जिससे खाद्य सुरक्षा संकट पैदा हो सकता है। लंबे समय में कैंसर, श्वसन रोग और तंत्रिका संबंधी समस्याएं बढ़ने की आशंका है।जैव विविधता पर असर गंभीर है। फारस की खाड़ी का समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पहले से ही तेल उद्योग से त्रस्त है। अब युद्ध ने इसे और बदतर बना दिया। मैंग्रोव और कोरल रीफ्स तेल की परत से मर सकते हैं, जो मछली और पक्षियों के लिए आश्रय हैं। 1991 के गल्फ वॉर में तेल रिसाव ने हज़ारों पक्षियों और समुद्री जीवों को मार डाला था। अब भी CEOBS ने 120 पर्यावरणीय घटनाओं की पहचान की है, जिनमें 92 उच्च जोखिम वाली हैं। सैन्य ठिकानों पर हमलों से निकले धुएं में डाइऑक्सिन और फ्यूरान जैसे विषैले पदार्थ हैं, जो खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर रहे हैं।दीर्घकालिक प्रभाव वैश्विक स्तर पर भी महसूस होंगे। तेल उत्पादन घटने से अल्पावधि में उत्सर्जन कम हो सकता है, लेकिन ऊर्जा कीमतों में उछाल से कोयला या अन्य जीवाश्म ईंधन का उपयोग बढ़ सकता है। UN ने ‘गंभीर पर्यावरणीय चिंताओं’ की बात कही है। स्वास्थ्य जोखिम, मिट्टी की उर्वरता ह्रास और समुद्री जीवन का विनाश दशकों तक रहेगा। युद्ध के कारण निगरानी मुश्किल हो गई है, जिससे क्षति का आंकलन और कठिन है।निष्कर्ष में, ईरान-इजरायल युद्ध की ऊर्जा केंद्रों पर बमबारी ने पर्यावरण को अपूरणीय क्षति पहुंचाई है। तेल टैंकरों के जलने से समुद्री प्रदूषण, रिफाइनरी आग से अम्लीय बारिश और विषैला धुआं—ये सब मिलकर हवा, पानी, मिट्टी और जीवन को तबाह कर रहे हैं। 1991 के गल्फ वॉर की तरह यह युद्ध भी पर्यावरणीय आपदा साबित हो रहा है। विशेषज्ञ जैसे डग वियर (CEOBS) चेताते हैं कि सिविलियन सुविधाओं पर हमले जोखिम बढ़ा रहे हैं। शांति बहाली और पर्यावरणीय निगरानी जरूरी है, वरना मध्य पूर्व का नाजुक इकोसिस्टम हमेशा के लिए बदल जाएगा। यह युद्ध सिखाता है कि आधुनिक संघर्ष न केवल मानवीय बल्कि पर्यावरणीय भी विनाशक हैं।



