मैं क्यों दोषी हो जाती हूं,जब घटता है यह नामांकन…

मैं क्यों दोषी हो जाती हूं,जब घटता है यह नामांकन।
मेरे भीतर का शिक्षक तब, चीख चीख करता क्रंदन।
कितनी रैली,कितने नुक्कड़, कितने नाटकअब हैं बाकी।
क्यों करते हो खिलवाड़ सदा,क्या हुआ नहीं इतना काफ़ी।
वक्त था घर घर जाने का,तब लगा दिए थे प्रशिक्षण।
मेरे भीतर का शिक्षक तब, चीख चीख करता क्रंदन ।
अभिभावक के संग बच्चे जब,हाथ पकड़ कर आते हैं।
नामांकन होगा अब तो पक्का,यह सोच सोच हर्षाते हैं।
कितनी उम्मीद से करते हैं,अभिभावक का अभिनंदन।
मेरे भीतर का शिक्षक तब चीख चीख करता क्रंदन।
आधार भले ही बालक का,सांसें मेरी क्यों अटकी हैं।
हिन्दी में सोनू सही लिखा,अंग्रेज़ी में मात्रा भटकी है।
मिल जाए यदि दुर्लभ जन,कंठ लगा करूं आलिंगन।
मेरे भीतर का शिक्षक तब ,चीख चीख करता क्रंदन।
आधार बनाने का ज़िम्मा,जब मेरे हिस्से आया था।
ख़ुद को समझा ब्रह्मा जी,मन यही सोच हर्षाया था।
मेरे हस्ताक्षर से हो जाता,शुद्ध नाम तिथि का अंकन।
मेरे भीतर का शिक्षक तब, चीख चीख करता क्रंदन।
अभिभावक संपर्क का बीड़ा,जब शिक्षक ने उठाया ।
बाल वाटिका के अभाव में, स्वयं को ठगा सा पाया।
चला गया पब्लिक स्कूल में,पांच वर्ष का शिवनंदन।
मेरे भीतर का शिक्षक तब,चीख चीख करता क्रंदन।
सूझे कोई उपाय यदि तो रेखा मुझे भी समझाना।
इन तुगलकी फरमानों में यूं बेवजह न उलझाना।
कोई तो होगा हल इसका, जो मेरे मन में है उलझन।
मेरे भीतर का शिक्षक तब, चीख चीख करता क्रंदन।
रेखा रानी, प्रधानाध्यापिका
उच्च प्राथमिक विद्यालय, गजरौला





